जब शरीर जवाब दे जाए और दर्द जिंदगी से ज्यादा भारी पड़ने लगे, तब एक इंसान क्या चाहता है? डॉक्टर उसे बचाने की लाख कोशिश कर सकते हैं, पर एक वक्त ऐसा आता है जहां इलाज सिर्फ यातना बन जाता है। न्यूयॉर्क ने इस हकीकत को स्वीकार करते हुए हाल ही में जो कदम उठाया है, उसने दुनिया भर में एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या हर व्यक्ति को अपनी मौत खुद तय करने का हक होना चाहिए।
न्यूयॉर्क का मेडिकल एड इन डाइंग एक्ट अगस्त 2026 से लागू हो चुका है। गवर्नर कैथी होचुल के इस फैसले के साथ ही न्यूयॉर्क अमेरिका का चौदहवां ऐसा राज्य बन गया है, जहां गंभीर रूप से बीमार लोगों को चिकित्सकीय सहायता से अपनी जीवनलीला समाप्त करने का कानूनी अधिकार मिल गया है। नियम साफ हैं। अगर किसी मरीज के पास जीने के लिए केवल छह महीने या उससे कम का वक्त बचा है और वह मानसिक रूप से बिल्कुल स्पष्ट है, तो वह डॉक्टर से जानलेवा दवा का प्रिस्क्रिप्शन मांग सकता है। यहां कोई डॉक्टर किसी को सुई नहीं लगाता। मरीज खुद अपने हाथ से वह दवा लेता है। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए पांच दिन की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि, दो डॉक्टरों की सहमति और दो गवाहों का होना जरूरी किया गया है। लेकिन भारत में हालात बिल्कुल अलग रास्ते पर चलते हैं। Learn more on a connected issue: this related article.
भारत में इच्छामृत्यु यानी यूथनेशिया की कहानी अदालती लड़ाइयों और संविधान के पन्नों से होकर गुजरती है। हमारे यहां संसद ने इस पर कोई कानून नहीं बनाया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इसकी रूपरेखा तय की है। अरुणा शानबाग का वह दर्दनाक मामला किसे याद नहीं है, जो मुंबई के केईएम अस्पताल में दशकों तक बिस्तर पर अचेत पड़ी रहीं। उनकी उस लंबी पीड़ा ने देश को हिलाकर रख दिया था। हालांकि कोर्ट ने तब उन्हें इच्छामृत्यु नहीं दी, लेकिन साल 2018 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार जीने के अधिकार यानी अनुच्छेद 21 का ही हिस्सा है।
यहीं पर भारत और न्यूयॉर्क की व्यवस्था में एक बहुत बड़ा फर्क सामने आता है। भारत में केवल पैसिव यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कोई मरीज वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट पर है और उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची है, तो डॉक्टर परिवार और मेडिकल बोर्ड की सहमति से जीवन रक्षक उपकरण हटा सकते हैं। इसके बाद जो होगा, वह प्रकृति तय करेगी। कोई डॉक्टर मरीज को सीधे कोई ऐसी दवा नहीं दे सकता जिससे उसकी मौत तत्काल सुनिश्चित हो जाए। भारत में एक्टिव इच्छामृत्यु और फिजिशियन-असिस्टेड सुसाइड आज भी पूरी तरह अपराध हैं। गाजियाबाद के हरीश राणा का मामला इसका उदाहरण है, जो तेरह साल तक बिस्तर पर अचेत रहने के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति पा सके। Further reporting by Al Jazeera delves into related perspectives on the subject.
फर्क बहुत बुनियादी है। भारत में कानून उन लोगों के लिए काम करता है जो कोमा में हैं, बोल नहीं सकते और खुद फैसला लेने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे मामलों में लिविंग विल यानी अग्रिम वसीयत और डॉक्टरों का बोर्ड अहम भूमिका निभाता है। इसके विपरीत, न्यूयॉर्क का नया कानून उन लोगों को अधिकार देता है जो होश में हैं, अपनी बीमारी की गंभीरता को समझते हैं और अपने होशोहवास में खुद अपनी मौत का वक्त चुनना चाहते हैं।
दुनिया भर में इस मोर्चे पर तेजी से बदलाव आ रहा है। नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया के सभी राज्यों में चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। कुछ देशों में तो इसे लाइलाज बीमारियों के अलावा गंभीर मानसिक और शारीरिक पीड़ा से जूझ रहे लोगों तक भी बढ़ा दिया गया है। दूसरी तरफ ब्रिटेन जैसे देश अभी भी इस पर मंथन ही कर रहे हैं।
जब आप इन दोनों व्यवस्थाओं को आमने-सामने रखते हैं, तो समझ आता है कि भारत का कानूनी ढांचा अभी भी अत्यधिक सुरक्षात्मक और रूढ़िवादी है। यहां हम मशीनें हटाने की अनुमति तो देते हैं, लेकिन व्यक्ति को अपने अंत का खुद मालिक बनने की छूट नहीं देते। कानून की इन बारीकियों को समझना और यह स्वीकार करना जरूरी है कि गरिमापूर्ण जीवन की तरह गरिमापूर्ण मृत्यु भी इंसान का हक होना चाहिए।