पाकिस्तानी हुकूमत को समझ नहीं आ रहा कि वो क्या करे। कश्मीर का जो राग अलाप कर वो दशकों से दुनिया को बेवकूफ बनाते आए हैं, वही दांव आज उनके गले की फांस बन चुका है. पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जो आग सुलग रही है, उसे बुझाने में पाकिस्तान के गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के पसीने छूट रहे हैं. ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में हो रहा यह आंदोलन अब सिर्फ सस्ती रोटी और सस्ती बिजली की मांग तक सीमित नहीं रहा. यह सीधे-सीधे पाकिस्तान के वजूद और उसकी सेना की बर्बरता के खिलाफ खुली बगावत बन गया है.
ताजा खुफिया इनपुट बेहद डराने वाले हैं. जब कोई देश अपने ही नागरिकों से डरने लगता है, तो वो नीचता की सारी हदें पार कर देता है. पाकिस्तान भी यही कर रहा है. You might also find this connected coverage interesting: Why Maidstone Residents Are Furious Over The Grange Moor Hotel Conversion.
आंदोलन कुचलने के लिए आतंकियों की फौज उतारेगा पाकिस्तान
खुफिया रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने एक बेहद खौफनाक ब्लूप्रिंट तैयार किया है. वे सीधे तौर पर सेना या पुलिस को खुली कार्रवाई के लिए नहीं उतार रहे. इसके बजाय, लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के पाले हुए आतंकियों को आम नागरिकों के भेष में भीड़ के अंदर घुसाया जा रहा है.
यह साजिश कितनी गहरी है, इसे समझना बहुत जरूरी है: As reported in recent reports by BBC News, the effects are significant.
- हिंसा फैलाना: ये आतंकी भीड़ का हिस्सा बनकर सुरक्षाबलों पर पेट्रोल बम फेंकेंगे, पत्थरबाजी करेंगे और आगजनी करेंगे.
- दमन का बहाना: जैसे ही आंदोलन में हिंसा होगी, पाकिस्तानी सेना इसे "आतंकी साजिश" करार देकर आम लोगों पर सीधे गोलियां बरसाने का लाइसेंस पा जाएगी.
- नैरेटिव बदलना: JAAC के शांतिपूर्ण, आर्थिक मांगों वाले आंदोलन को 'जिहादी आंदोलन' या 'भारत समर्थित विद्रोह' साबित करने की पूरी तैयारी है.
यह कोई काल्पनिक डर नहीं है. मुजफ्फराबाद मार्च और रावलकोट में जिस तरह की नाकेबंदी की जा रही है, वो साफ दिखाती है कि पाकिस्तान इस आंदोलन को किसी भी हद तक जाकर दबाना चाहता है.
क्या है यह JAAC और इसके पीछे का असली गुस्सा?
ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कोई राजनीतिक दल नहीं है. यह स्थानीय व्यापारियों, वकीलों, छात्रों और आम नागरिकों का एक ऐसा मंच है जो पाकिस्तान के सौतेले व्यवहार से पूरी तरह तंग आ चुके हैं.
आप खुद सोचिए, PoK के पनबिजली प्रोजेक्ट्स (Hydroelectric Projects) से पाकिस्तान को बेहद सस्ती बिजली मिलती है. लेकिन उसी बिजली के लिए वहां के स्थानीय लोगों से भारी टैक्स वसूला जाता है. इसके अलावा, आटे और अन्य आवश्यक चीजों पर सब्सिडी खत्म कर दी गई. जब लोगों ने बुनियादी हक मांगे, तो उन्हें पुलिस की लाठियां और आंसू गैस के गोले मिले. पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र में कई नागरिक पुलिस की गोलीबारी में मारे जा चुके हैं.
पहली बार भारत से गुहार और पाकिस्तान की घबराहट
इस पूरे घटनाक्रम में जो बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभ रही है, वो है JAAC नेताओं का हालिया रुख. आंदोलन के बड़े चेहरे, जैसे सरदार अमन खान, अब खुलकर पाकिस्तानी सेना के जुल्मों के खिलाफ बोल रहे हैं. उन्होंने पहली बार भारत से मानवीय सहायता की अपील की है और नियंत्रण रेखा (LoC) को खोलने की मांग की है ताकि संकटग्रस्त आबादी को राहत मिल सके.
यह बयान पाकिस्तान की उस पूरी थ्योरी को ध्वस्त कर देता है जो वो सालों से संयुक्त राष्ट्र में गाता रहा है. जब PoK के लोग ही भारत की तरफ उम्मीद से देख रहे हों, तो पाकिस्तान के पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ नहीं बचता. यही वजह है कि शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर इस आंदोलन को देशद्रोह घोषित करने पर आमादा हैं.
आगे की राह और वास्तविक स्थिति
पाकिस्तान के लिए PoK की यह बगावत संभालना अब मुमकिन नहीं लग रहा. देश खुद कर्ज के दलदल में डूबा है, बलूचिस्तान पहले से ही जल रहा है, और अब कश्मीर के कब्जे वाले हिस्से में गृहयुद्ध जैसे हालात बन रहे हैं.
यदि आप भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रखना चाहते हैं, तो इन अहम बदलावों को समझने की जरूरत है:
- इंटरनेट ब्लैकआउट पर ध्यान दें: पाकिस्तान सरकार अक्सर सूचनाओं को दबाने के लिए PoK में इंटरनेट बंद कर देती है. स्वतंत्र पत्रकारों की रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया अपडेट्स को अलग-अलग स्रोतों से क्रॉस-चेक करते रहें.
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: देखें कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मानवाधिकार संगठन PoK में हो रहे नागरिक अधिकारों के हनन पर क्या रुख अपनाते हैं.
- स्थानीय एकजुटता: JAAC के मुजफ्फराबाद मार्च और रावलकोट प्रदर्शनों के लाइव अपडेट्स पर नजर रखें, क्योंकि यही तय करेंगे कि पाकिस्तान सेना की आतंकी साजिश कितनी हद तक कामयाब हो पाती है.
पाकिस्तान चाहे जितना भी दमन कर ले, लेकिन जब कोई कौम अपनी पहचान और वजूद के लिए सड़क पर उतर आती है, तो उसे बंदूकों के दम पर हमेशा के लिए खामोश नहीं रखा जा सकता.